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मैं दोपहर का चाँद हूँ 


चमका मैं बहुत ज़ोर से 

फिर डर गया उस भोर से

 वहम में हूँ भगवान हूँ

 मैं दोपहर का चाँद हूँ


इसमें जमने का कोई दोष नहीं 

मुझे खुद का ही कोई होश नहीं 

दूसरों की चमक की पहचान हूँ

 मैं दोपहर का चाँद हूँ


किसी एक रूप का व्यक्तित्व नहीं

 एक दिन पूर्ण हूँ तो एक दिन अस्तित्व नहीं

 सिर्फ रात्रि का मेहमान हूँ

 मैं दोपहर का चाँद हूँ


प्रेम की मैं भाषा हूँ 

चकोर की मैं आशा हूँ 

अर्थ अनर्थ विद्वान हूँ 

मैं दोपहर का चाँद हूँ


न अंत में उसका काम था 

वो प्रारंभ से बेनाम था 

संकोच का परिणाम हूँ 

मैं दोपहर का चाँद हूँ