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Nani ka ghar


आज भी वहाँ जाता हूँ तो चेहरे पर मुस्कान आ जाती है,

 सारे पुराने मोहल्ले, सारी गलियां याद आ जाती हैं। 

जहाँ की शाम खिलखिलाती और चहकती सी भोर है,

 वो मेरे नानी का घर है, उनकी तो बात ही कुछ और है।


चाहे जो माँग लिया हो, मना नहीं करतीं, 

खिलाती हैं बहुत सारा, रोकने पर सुना नहीं करतीं।

बिना देखे आहट से भी पहचान जाती हैं,

 क्या है न उनकी आँखें थोड़ी कमज़ोर हैं? 

वो मेरी नानी जी हैं, उनकी तो बात ही कुछ और है।


चाहे कितना ही काम क्यों न हो, भाग कर आ जाती हैं,

 जब कोई उन्हें मेरे आने की खबर बताती है। 

गर्मी हो, बारिश हो या हो ठंड का मौसम, जो भी खिलाती हैं,

 उनके स्वाद का कहाँ कोई तोड़ है?

 वो मेरे नानी का घर है, उनकी तो बात ही कुछ और है।


वापस जाने का कहता हूँ तो उनकी आँखें भर आती हैं, 

फिर चुपके से एक छोटा सा नोट मेरे हाथों में दबाती हैं।

 बहुत सारा लाड-प्यार और दुलार दिखाती हैं, 

ये इतने प्यार का शायद आखिरी दौर है,

 वो मेरी नानी जी हैं, उनकी बात ही कुछ और है।


                                                                                                                                                    :-     आयुष राउत