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जिसे हम साथ नहीं लाए..


मैं हमेशा से भूत-प्रेत जैसी चीज़ों पर विश्वास नहीं करता था।

लोग जब डरावनी कहानियाँ सुनाते थे — जंगल में दिखी औरत, सुनसान सड़कें, रात में आवाज़ें — तो मुझे लगता था कि ये सब इंसान के डर और दिमाग का खेल है। मैं हर चीज़ का कोई न कोई तर्क ढूँढ लेता था।

लेकिन कुछ साल पहले मेरे साथ जो हुआ… उसने मेरी सोच हमेशा के लिए बदल दी।

उस समय सर्दियों के दिन चल रहे थे। मैं और मेरे पापा एक प्रोजेक्ट के फील्ड वर्क के लिए घर से लगभग 50 किलोमीटर दूर गए हुए थे। उस समय मैंने नई-नई कार चलाना शुरू किया था। मुझे ड्राइविंग आती तो थी, लेकिन रात में लंबा सफर करने का अनुभव नहीं था।

उस दिन काम बहुत ज्यादा था। भाग-दौड़, लोगों से मिलना, जगह-जगह जाना… करते-करते कब रात हो गई, पता ही नहीं चला।

जब हम वापस निकलने लगे, तब तक सड़कें लगभग खाली हो चुकी थीं। ठंडी हवा चल रही थी और चारों तरफ अजीब सा सन्नाटा था।

पापा बहुत थक चुके थे। कार में बैठते ही उन्होंने गहरी साँस ली और मुझे चाबी देते हुए बोले—

“बेटा, तू चला ले… और ध्यान से चलाना। धीरे चलाना।”

मैंने मुस्कुराकर कहा,

“ठीक है पापा।”

मैंने गाड़ी स्टार्ट की और घर की तरफ निकल पड़े।

शुरुआत में सब सामान्य था। सड़क जंगल वाले इलाके से होकर गुजरती थी। कभी-कभी दूर कोई छोटा सा घर दिख जाता, लेकिन ज्यादातर रास्ता घने पेड़ों और अंधेरे से भरा हुआ था।

कुछ ही देर में पापा मेरी बगल वाली सीट पर सो गए।

मैं धीरे-धीरे गाड़ी चला रहा था। ठंड इतनी थी कि कार के शीशों पर हल्का धुंध जमने लगा था। सड़क पर हमारी गाड़ी के अलावा कोई नहीं था।

करीब 10–12 किलोमीटर चलने के बाद, जंगल के बिल्कुल बीचों-बीच मुझे आगे सड़क पर कोई दिखाई दिया।

एक औरत।

वो सड़क पार कर रही थी।

पहले मुझे कुछ अजीब नहीं लगा। मैंने सोचा शायद आसपास के किसी गाँव की होगी। इसलिए मैंने गाड़ी की स्पीड कम करनी शुरू कर दी।

40…

30…

20…

और फिर लगभग 10 किलोमीटर प्रति घंटा।

जैसे-जैसे मैं उसके करीब पहुँच रहा था, मेरे अंदर अजीब बेचैनी बढ़ने लगी।

वो औरत बहुत लंबी थी। लगभग 6 फीट।

उसने सफेद और हल्के बैंगनी रंग की साड़ी पहन रखी थी, लुगड़ा स्टाइल में। उसके बाल चेहरे पर फैले हुए थे।

लेकिन सबसे अजीब उसकी चाल थी।

वो सामान्य इंसानों की तरह नहीं चल रही थी।

पहले मुझे लगा शायद उसके पैर में कोई दिक्कत होगी। लेकिन पता नहीं क्यों, मेरी नजर अचानक उसके पैरों पर चली गई।

और उसी पल…

मेरे पूरे शरीर में जैसे करंट दौड़ गया।

उसके पैर सामान्य नहीं थे।

ऐसा लग रहा था जैसे उसके पंजे मुड़े हुए हों… बंद मुट्ठी की तरह। और वो हर कदम पर हल्का-हल्का उछलकर चल रही थी।

उसे देखते ही मेरा गला सूख गया।

मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।

ऐसा डर मैंने अपनी जिंदगी में पहले कभी महसूस नहीं किया था।

बिना सोचे-समझे मेरा पैर एक्सीलेटर पर जोर से पड़ गया।

गाड़ी अचानक तेज भागने लगी।

जैसे ही हम उसके पास से निकले, एक सेकंड के लिए उसका चेहरा हमारी तरफ घूमा।

मैं आज तक वो पल नहीं भूल पाया।

मेरे हाथ स्टेयरिंग पर ऐसे जकड़ गए जैसे किसी ने पकड़ लिए हों। मैं चाहकर भी उन्हें हिला नहीं पा रहा था। गाड़ी अभी भी सेकंड गियर में थी और इंजन जोर-जोर से आवाज करने लगा।

उसी आवाज से पापा की नींद खुल गई।

उन्होंने घबराकर कहा—

“कैसे चला रहा है बेटा? गाड़ी रोक… मैं चलाता हूँ।”

और अचानक जैसे मेरी चेतना वापस आ गई।

मैंने तुरंत गाड़ी साइड में लगाई। मेरे हाथ काँप रहे थे। हम दोनों ने सीट बदली।

डैशबोर्ड पर छोटी सी गणेश जी की मूर्ति रखी थी। मैंने उसे उठाकर अपने सीने से लगा लिया।

पापा फिर गाड़ी चलाने लगे।

मैंने आँखें बंद कर लीं।

मेरा दिमाग बार-बार वही दृश्य सोच रहा था।

वो औरत…

उसके पैर…

उसकी चाल…

मैं समझ नहीं पा रहा था कि मैंने सच में क्या देखा था।

करीब दो मिनट बाद पापा बोले—

“चल, घर आ गया।”

मैंने तुरंत आँखें खोलीं।

मुझे लगा पापा मजाक कर रहे हैं।

लेकिन नहीं।

हम सच में घर पहुँच चुके थे।

बाकी का लगभग 35 किलोमीटर का रास्ता कब खत्म हो गया, मुझे कुछ याद ही नहीं।

मैं चुपचाप अंदर गया, कपड़े बदले और बिस्तर पर लेट गया।

उस रात करीब 3 बजे मेरी माँ अचानक डरकर उठीं। उनका चेहरा घबराया हुआ था और साँस तेज चल रही थी।

मैंने उन्हें पानी दिया और किसी तरह शांत कराया। फिर वो दोबारा सो गईं।

सुबह जब हम सब नाश्ता कर रहे थे, तब माँ ने रात के सपने के बारे में बताना शुरू किया।

उन्होंने कहा—

“मैंने सपने में देखा कि हमारे घर के बाहर एक बहुत लंबी औरत खड़ी थी… लगभग 6 फीट। वो दरवाजा बहुत जोर-जोर से पीट रही थी और बार-बार कह रही थी…”

“तुम लोग मुझे अपने साथ लेकर नहीं आए…”

ये सुनते ही मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।

माँ ने आगे बताया—

“उसने सफेद और बैंगनी रंग की साड़ी पहन रखी थी… लुगड़ा स्टाइल में।”

मेरे हाथ से चाय का कप लगभग छूट गया।

मेरे पापा भी अचानक चुप हो गए।

उस पल मुझे समझ आ गया कि जो मैंने रात में देखा था… वो सिर्फ मेरा वहम नहीं था।

मैंने तुरंत माँ को पूरी बात बताई।

घर में कुछ देर के लिए बिल्कुल सन्नाटा छा गया।

आज उस घटना को कई साल बीत चुके हैं।

मैं अब भी नहीं जानता कि वो क्या था।

शायद कोई भ्रम…

शायद थकान…

या शायद सच में कुछ ऐसा, जिसे इंसान समझ नहीं सकता।

लेकिन आज भी जब मैं उस रात के बारे में सोचता हूँ, मेरे शरीर में वही सिहरन दौड़ जाती है।

और तब मुझे एहसास होता है…

कि दुनिया में शायद सब कुछ उतना साधारण नहीं है, जितना हम सोचते हैं।