वो स्ट्रीट लाइट..
हमारी कॉलोनी के मोड़ पर एक पुरानी स्ट्रीट लाइट खड़ी थी।
आज के बच्चों के लिए वह बस लोहे का एक खंभा रही होगी, लेकिन हमारे परिवार के लिए वह यादों का एक पूरा खज़ाना थी।
जब भी रात में हम उस रास्ते से गुजरते, पिताजी अक्सर उसकी ओर इशारा करके मुस्कुरा देते और कहते—
"यहीं बैठकर मैं और तुम्हारे चाचा पढ़ाई किया करते थे।"
उन दिनों हर घर में पर्याप्त रोशनी नहीं होती थी। बिजली का आना-जाना लगा रहता था। तब उस एक स्ट्रीट लाइट की पीली रोशनी कई सपनों का सहारा बन जाती थी।
पिताजी बताते थे कि वे अपनी किताबें लेकर उसके नीचे बैठ जाते। कभी गणित के सवाल हल करते, कभी परीक्षाओं की तैयारी करते। पढ़ाई से थक जाते तो वहीं दोस्तों के साथ खेलना शुरू कर देते।
वह स्ट्रीट लाइट सिर्फ़ रोशनी नहीं देती थी, वह बच्चों के सपनों को भी उजाला देती थी।
उसकी रोशनी में न जाने कितने विद्यार्थियों ने अपने भविष्य के सपने देखे होंगे।
कितने मज़दूर देर रात घर लौटते समय उसी की रोशनी में रास्ता पहचानते होंगे।
कितनी माताएँ अपने बच्चों का इंतज़ार करते हुए उसी रोशनी की ओर देखती होंगी।
वह हर किसी की साथी थी।
बरसात आई, आँधियाँ आईं, तेज़ हवाएँ चलीं।
कभी उसके शीशे टूटे, कभी रंग उखड़ गया।
लेकिन वह वहीं खड़ी रही—बिना शिकायत, बिना थके।
उसने पीढ़ियाँ बदलते देखीं।
बच्चों को बड़ा होते देखा।
दोस्तों को बिछड़ते देखा।
पुराने घरों को टूटते और नए मकानों को बनते देखा।
वह चुपचाप सब कुछ देखती रही।
फिर समय बदला।
हर घर में तेज़ एलईडी बल्ब आ गए।
मोबाइल फोन की टॉर्च ने अँधेरे को छोटा कर दिया।
बच्चे अब मैदानों से ज़्यादा स्क्रीन पर समय बिताने लगे।
धीरे-धीरे उस स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठने वाले लोग कम होते गए।
आज वह पुरानी स्ट्रीट लाइट वहाँ नहीं है।
उसकी जगह आधुनिक लाइटें लग गई हैं।
वे ज़्यादा चमकदार हैं, ज़्यादा नई हैं, और शायद ज़्यादा बेहतर भी।
लेकिन उनमें वो कहानियाँ नहीं हैं।
वो यादें नहीं हैं।
वो अपनापन नहीं है।
आज जब मैं उस खाली जगह को देखता हूँ, तो लगता है जैसे हमारी संस्कृति का एक छोटा-सा हिस्सा हमारे साथ नहीं रहा।
क्योंकि कुछ चीज़ें सिर्फ़ चीज़ें नहीं होतीं।
कुछ खंभे, कुछ पेड़, कुछ पुरानी मशीनें और कुछ स्ट्रीट लाइटें...
हमारी ज़िंदगी के गवाह बन जाती हैं।
उन्होंने लाखों लोगों को रास्ता दिखाया,
हज़ारों सपनों को रोशनी दी,
और बदले में कभी कुछ नहीं माँगा।
शायद इसी लिए आज भी जब पिताजी उस जगह से गुजरते हैं, उनकी आँखों में एक हल्की-सी चमक आ जाती है।
क्योंकि उन्हें सिर्फ़ एक स्ट्रीट लाइट याद नहीं आती...
उन्हें अपना बचपन याद आता है।
— आयुष राउत
वो ट्रांसफॉर्मर..
हमारा गाँव बहुत छोटा था—सिर्फ़ सात–आठ घर।
मगर उन घरों की धड़कन एक ही थी।
गाँव के किनारे खड़ा वह पुराना ट्रांसफॉर्मर।
पिछले अड़तीस–उनतालीस सालों से वही हमें रोशनी देता आया था।
उसी की बदौलत हमारे आँगन में बल्ब जले, रातों में पंखे चले, कुएँ से पानी निकला, और खेतों में फ़सलें लहलहाईं।
हम उसी रोशनी में बच्चे से जवान हुए।
उसी की हल्की-सी घरघराहट के बीच हमारी नींद पूरी हुई।
कभी हमने सोचा भी नहीं था कि एक दिन वह रुक जाएगा—आख़िर मशीन ही तो है, कब तक चलती?
बचपन में हमने उस पर पत्थर भी फेंके। नादानी थी, शरारत थी।
वह चुपचाप सब सहता रहा—बिना शिकायत, बिना शोर।
उस सुबह अचानक तेज़ आवाज़ आई।
शॉर्ट सर्किट की एक चिंगारी, एक झटका।
हमने सोचा—आम बात होगी। किसी ने बिजली विभाग को फोन कर दिया।
धीरे-धीरे पूरे गाँव के लोग इकट्ठा हो गए।
सबकी नज़र उसी जगह पर थी जहाँ वह सालों से खड़ा था।
बिजली विभाग की टीम आई और बस इतना कहा— “अब यह ट्रांसफॉर्मर सर्विस में नहीं है।” इतना सुनते ही दिल जैसे खाली हो गया।
मुझे लगा जैसे परिवार का कोई बुज़ुर्ग चला गया हो।
वह जिसने बिना कुछ माँगे सब कुछ दिया।
गर्मी में राहत, रात में सुकून, फ़सल में जान।
आज अचानक चुप हो गया। उस जगह पर गाँव के हर घर से लोग आए थे।
वही लोग जिनके बीच छोटे–छोटे मनमुटाव थे, वही लोग जो रोज़ मुश्किल से एक-दूसरे से बात करते थे।
आज सब खामोश थे—एक ही दुःख में जुड़े हुए।
चार दशक तक जिसने हमें रोशनी, पानी और ज़िंदगी दी, आज उसके “रिटायरमेंट” के गवाह हम सब थे।
शाम तक नया ट्रांसफॉर्मर आ गया।
स्थापना में हर किसी ने हाथ बँटाया।
जब बिजली फिर से आई, बल्ब दोबारा जले, तो गाँव में उजाला लौट आया।
मगर… दिल के किसी कोने में अँधेरा रह गया। रोशनी थी, पर वो अपनापन नहीं था।
आवाज़ वही थी, पर एहसास बदल चुका था। आज हमने समझा— कुछ मशीनें सिर्फ़ मशीन नहीं होतीं।
कुछ लोहे के ढाँचे पूरी पीढ़ियों की यादें बन जाते हैं।
और जब वो चले जाते हैं, तो बिजली तो लौट आती है…
मगर एक दौर, एक एहसास, हमेशा के लिए चला जाता है।
— आयुष राउत
वो आम का पेड़..
मेरे घर के ठीक बगल में एक आम का पेड़ खड़ा है। कहते हैं, उसे मेरे परदादा के पिता ने लगाया था।
ठीक-ठीक कोई नहीं जानता कि उसकी उम्र कितनी है, लेकिन सौ साल के आसपास तो वह ज़रूर होगा।
जब से मैंने होश संभाला है, उसे वहीं खड़ा देखा है—चुपचाप, स्थिर, जैसे घर का कोई सबसे बुज़ुर्ग सदस्य।
गर्मियों की दोपहरों में जब उसके आम पककर तैयार होते, तो कभी-कभी कोई आम टूटकर हमारे टीन की छत पर गिरता।
"धम्म्म!" की आवाज़ पूरे घर में गूँज जाती।
बस फिर क्या था, मैं और मेरी बहन किसी दौड़ के खिलाड़ियों की तरह भागते हुए बाहर निकल पड़ते।
हम दोनों की नज़र एक ही आम पर होती और छोटी-सी जंग शुरू हो जाती कि पहले कौन उसे उठाएगा।
उस समय वह आम किसी खज़ाने से कम नहीं लगता था।
उस पेड़ की एक और खासियत थी।
उसका तना अंदर से खोखला हो चुका था।
बचपन में हम उस खोखले हिस्से को बड़े कौतूहल से देखते थे।
एक रात अचानक उसी खोखले हिस्से में आग लग गई।
पता नहीं कैसे, लेकिन देखते ही देखते धुआँ और लपटें अंदर से उठने लगीं।
उस रात हमारा पूरा परिवार अग्निशामक दल बन गया था।
कोई बाल्टी में पानी भर रहा था, कोई पाइप संभाल रहा था, कोई मिट्टी डाल रहा था।
हम सब एक ही कोशिश में लगे थे—किसी तरह अपने उस बूढ़े साथी को बचा लें।
कई घंटों की मेहनत के बाद आग बुझी और पेड़ बच गया। उस रात पहली बार समझ आया कि वह सिर्फ़ एक पेड़ नहीं था, हमारे परिवार का हिस्सा था।
अब वह बहुत बूढ़ा हो चुका है।
उसकी शाखाएँ नाज़ुक हैं, तना कमज़ोर है और वह पहले की तरह हर साल फल नहीं देता।
कभी दो साल बाद, कभी तीन साल बाद, उसकी किसी शाखा पर कुछ आम दिखाई दे जाते हैं।
लेकिन जब वे आम पकते हैं और हम उन्हें चखते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे स्वाद के साथ बचपन भी लौट आया हो।
वही मिठास, वही खुशबू, वही बेफ़िक्री।
मुझे याद है, मैं और मेरे दोस्त उसके नीचे खड़े होकर शर्त लगाते थे कि कौन पत्थर मारकर आम गिराएगा।
कोई निशाना चूक जाता, कोई शाखा हिला देता, और कभी-कभी कोई आम सचमुच नीचे आ गिरता।
तब हमारी खुशी का कोई ठिकाना नहीं होता था।
आज वे यादें धुंधली होने लगी हैं, जैसे पुराने फोटो का रंग धीरे-धीरे फीका पड़ जाता है।
अब जब मैं उस पेड़ को देखता हूँ, तो उसमें सिर्फ़ लकड़ी और पत्ते नहीं दिखते।
उसमें अपने परिवार की कई पीढ़ियाँ दिखती हैं।
परदादा के हाथों का लगाया हुआ एक सपना दिखता है।
अपनी बहन के साथ की दौड़ दिखती है। दोस्तों की हँसी सुनाई देती है। ग
र्मियों की दोपहरें, बरसात की खुशबू और बीते हुए सालों की अनगिनत कहानियाँ दिखाई देती हैं।
हम जानते हैं कि एक दिन वह पेड़ गिर जाएगा।
शायद कल, शायद कुछ साल बाद। समय के आगे कोई हमेशा खड़ा नहीं रह सकता।
लेकिन डर पेड़ के गिरने का नहीं है।
डर इस बात का है कि उसके साथ कहीं हमारे बचपन का एक हिस्सा भी न गिर जाए।
हमारे घर की यादों का एक कोना, हमारी शरारतें, हमारी हँसी, और वे सारे पल जो अब सिर्फ़ यादों में बसते हैं।
फिर भी शायद पेड़ सचमुच कभी नहीं मरते।
वे अपनी छाया में बिताए हुए दिनों में ज़िंदा रहते हैं।
उन कहानियों में ज़िंदा रहते हैं जो लोग उन्हें याद करके सुनाते हैं।
और जब भी कहीं आम की मीठी खुशबू हवा में घुलती है, मुझे लगता है कि हमारा वह बूढ़ा आम का पेड़ अब भी वहीं खड़ा है—शांत, धैर्यवान और मुस्कुराता हुआ, जैसे कह रहा हो, "मैं अभी भी यहीं हूँ।"
— आयुष राउत
वो पुलिया वाली सड़क..
हमारे गाँव में एक बहुत पुरानी पुलिया है। देखने में वह बस साधारण सी पुलिया लगती है — कुछ ईंटें, पत्थर और पुराना सीमेंट। लेकिन हमारे लिए वह सिर्फ एक पुलिया नहीं है। वह हमारे गाँव की यादों, कहानियों और बीते हुए समय की गवाह है। इतने सालों से लोग उसी रास्ते से आते-जाते रहे कि उस सड़क का नाम ही “पुलिया वाली सड़क” पड़ गया। आज भी अगर किसी नए आदमी को रास्ता बताना हो, तो लोग कहते हैं — “पुलिया वाली सड़क से चले जाओ।” शायद यही उसकी सबसे बड़ी पहचान है कि उसने खुद से ज्यादा उस रास्ते को पहचान दी।
उस पुलिया ने समय को बहुत करीब से देखा है। उसने मौसम बदलते देखे हैं, लोगों को बदलते देखा है, और पूरे गाँव को धीरे-धीरे बदलते देखा है। सुबह जब सूरज निकलता था, तो सबसे पहले खेतों की तरफ जाते किसान उसी रास्ते से गुजरते थे। उनके कंधों पर हल होता, हाथों में रस्सी होती और चेहरे पर मेहनत की चमक। थोड़ी देर बाद स्कूल जाते बच्चे वहाँ से शोर मचाते हुए निकलते। कोई भागता हुआ जाता, कोई देर होने पर किताबें सीने से लगाकर दौड़ता। शाम को वही बच्चे लौटते हुए पुलिया पर बैठ जाते, बातें करते और हँसी-मज़ाक करते।
बरसात के दिनों में पुलिया के नीचे से पानी बहता था। हम बच्चे घंटों वहाँ खड़े होकर पानी को देखते रहते। कभी लकड़ी का टुकड़ा बहाकर उसे नाव मान लेते, कभी बारिश में भीगते हुए पुलिया पर दौड़ लगाते। उस समय हमें यह नहीं पता था कि ये छोटे-छोटे पल ही आगे चलकर सबसे बड़ी यादें बन जाएँगे।
गाँव की कितनी ही बारातें उस पुलिया से होकर गुज़री हैं। रात के अंधेरे में जब ढोल-नगाड़े बजते, लाइटें चमकतीं और लोग नाचते हुए निकलते, तब पूरी पुलिया जैसे जीवित हो उठती थी। दूल्हे की घोड़ी, बच्चों का शोर, औरतों के गीत — सब कुछ उस रास्ते को त्योहार बना देता था। त्योहारों के दिनों में भी वहाँ अलग ही रौनक होती थी। होली हो, दिवाली हो या दशहरा, लोगों की भीड़ उसी रास्ते से गुजरती। पुलिया हर खुशी और हर जश्न की चुपचाप गवाह बनी रही।
लेकिन हमारे बचपन की सबसे खास बातें उससे जुड़ी डरावनी कहानियाँ थीं। जब हम छोटे थे, तो हमने उस पुलिया को लेकर न जाने कितनी अफवाहें बना रखी थीं। कोई कहता कि रात को वहाँ सफेद कपड़ों में कोई दिखाई देता है। कोई कहता कि आधी रात के बाद वहाँ से आवाज़ें आती हैं। हम सब डरते भी थे और मज़ा भी लेते थे। शाम ढलने के बाद अगर किसी को अकेले वहाँ से गुजरना पड़ जाए, तो वह जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाता था। लेकिन सच यह था कि डर के बावजूद हमें उस पुलिया से बहुत लगाव था। वह हमारी खेल की जगह थी, हमारी बैठकी थी, और हमारे बचपन का सबसे बड़ा हिस्सा थी।
समय कभी रुकता नहीं। धीरे-धीरे हम बड़े हो गए। कुछ लोग शहर चले गए, कुछ अपने कामों में व्यस्त हो गए। गाँव में नई सड़कें बनने लगीं, नए घर बन गए, और लोगों की जिंदगी बदलने लगी। लेकिन वह पुरानी पुलिया वहीं खड़ी रही — चुपचाप, शांत और अकेली।
अब उसकी हालत पहले जैसी नहीं रही। उसकी दीवारों में दरारें पड़ चुकी हैं। कई जगह से सीमेंट टूट गया है और ईंटें दिखाई देने लगी हैं। पहले जो पुलिया मजबूत लगती थी, अब बहुत कमजोर दिखाई देती है। ऐसा लगता है जैसे उसने अपनी पूरी जिंदगी लोगों के लिए खड़े-खड़े बिताई हो और अब वह थक चुकी हो।
कभी-कभी मैं वहाँ जाकर खड़ा होता हूँ और उसे देखता रहता हूँ। मुझे लगता है जैसे वह भी हमें पहचानती हो। जैसे उसे याद हो कि कौन बच्चा वहाँ खेला करता था, कौन रोज़ स्कूल जाता था, और कौन डरते हुए रात में वहाँ से गुज़रा था। वह सिर्फ एक पुलिया नहीं, बल्कि हमारे गाँव की यादों की रखवाली करने वाली एक बूढ़ी साथी है।
शायद एक दिन वह पुलिया टूट जाएगी। शायद किसी दिन उसकी जगह नई पुलिया बन जाएगी। लेकिन नई चीज़ें कभी पुरानी यादों की जगह नहीं ले सकतीं। “पुलिया वाली सड़क” का नाम हमेशा रहेगा, और उसके साथ जुड़ी हमारी यादें भी।
क्योंकि कुछ जगहें सिर्फ रास्ते नहीं होतीं — वे हमारी जिंदगी का हिस्सा बन जाती हैं। और हमारे लिए, वह पुरानी पुलिया हमेशा हमारे बचपन, हमारे गाँव और हमारी यादों का सबसे खूबसूरत हिस्सा रहेगी।
— आयुष राउत
कमरा
कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था।
बाहर की दुनिया अपने रोज़ के शोर में व्यस्त थी, लेकिन उस कमरे के अंदर जैसे समय कहीं अटक गया था। दीवारों पर कुछ पुराने पोस्टर लगे थे, एक कोने में कैमरा रखा था, मेज़ पर लैपटॉप खुला हुआ था, बिस्तर के पास एक गिटार धूल की पतली परत ओढ़े खड़ा था, और अलमारी के ऊपर किताबों का ढेर रखा था।
पहली नज़र में वह कमरा किसी सपने जैसा लगता था।
ऐसा कमरा, जिसे पाने की इच्छा कभी किसी लड़के ने बड़े मन से की होगी।
लेकिन अजीब बात यह थी कि उस कमरे में रहने वाला लड़का जब हर सुबह उठता, तो उसे वहाँ कुछ भी अपना नहीं लगता था।
उसे सब कुछ होते हुए भी खालीपन महसूस होता था।
मेज़ पर रखा लैपटॉप कभी उसका सबसे बड़ा सपना था।
उसे याद था, जब वह दूसरों के वीडियो देखा करता था और सोचता था कि एक दिन उसका भी एक चैनल होगा। वह अपनी यात्राएँ रिकॉर्ड करेगा, कहानियाँ सुनाएगा, वीडियो एडिट करेगा और दुनिया को अपने नज़रिए से दिखाएगा।
उसने बहुत मेहनत करके वह लैपटॉप खरीदा था।
जब वह पहली बार घर आया था, तब उसकी आँखों में चमक थी।
लेकिन अब...
लैपटॉप हर दिन खुलता था, फिर बिना कुछ किए बंद हो जाता था।
स्क्रीन पर नए प्रोजेक्ट की जगह खाली फोल्डर पड़े रहते थे।
मानो सपनों ने खुद काम करना छोड़ दिया हो।
उसके पास कैमरा भी था।
वही कैमरा जिसे खरीदने के लिए उसने महीनों पैसे बचाए थे।
उसे लगता था कि कैमरा मिलते ही ज़िंदगी बदल जाएगी।
वह व्लॉग बनाएगा।
नई जगहों पर जाएगा।
बारिश रिकॉर्ड करेगा।
सड़कों की कहानियाँ सुनाएगा।
लेकिन कैमरा भी अब ज़्यादातर समय बैग में बंद रहता था।
जैसे किसी यात्रा का इंतज़ार करते-करते थक गया हो।
कमरे के दूसरे कोने में गिटार रखा था।
वह गिटार भी कभी एक सपना था।
उसने सोचा था कि एक दिन वह देर रात बैठकर गीत बजाएगा।
कुछ धुनें सीखेगा।
शायद अपने दुखों को तारों में बाँध देगा।
लेकिन उसने कभी गिटार ठीक से सीखा ही नहीं।
कुछ दिनों तक कोशिश की।
उँगलियाँ दुखीं।
फिर ज़िंदगी बीच में आ गई।
और गिटार वहीं का वहीं रह गया।
कभी-कभी वह उसे देखता और सोचता कि अधूरी चीज़ें भी इंसान को कितनी चुपचाप ताने मारती हैं।
अलमारी के ऊपर किताबें रखी थीं।
कुछ आधी पढ़ी हुई।
कुछ सिर्फ पहले अध्याय तक पहुँची हुई।
और कुछ ऐसी जिनके पन्ने आज भी वैसे ही नए थे जैसे खरीदने के दिन थे।
उन किताबों के बीच एक पतली सी डायरी भी थी।
उसकी अपनी कहानी।
उसका अपना छोटा उपन्यास।
कई रातों तक जागकर उसने उसे लिखा था।
किरदार बनाए थे।
उनके सपने बनाए थे।
उनकी मंज़िलें बनाई थीं।
लेकिन कहानी का अंत कभी नहीं लिख पाया।
जैसे अपनी ही ज़िंदगी का अंत समझ नहीं पाया।
डायरी का आखिरी पन्ना आज भी अधूरा था।
और शायद वही सबसे सच्चा पन्ना था।
क्योंकि अधूरापन ही उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई बन चुका था।
उसे समझ नहीं आता था कि आखिर उसके साथ हो क्या रहा है।
कुछ साल पहले तक सब कुछ कितना अलग था।
सपने थे।
योजनाएँ थीं।
उम्मीदें थीं।
और सबसे ज़रूरी बात, खुद पर भरोसा था।
फिर अचानक ज़िंदगी ने जैसे रफ़्तार पकड़ ली।
एक के बाद एक चीज़ें बदलती चली गईं।
व्यापार में नुकसान हुआ।
जिस काम को उसने संभालने की कोशिश की, वह हाथों से फिसलता गया।
कई महीनों की मेहनत कुछ दिनों में मिट गई।
फिर एक रिश्ता टूटा।
जिस इंसान के साथ उसने भविष्य की कल्पना की थी, वह अतीत बन गया।
कुछ लोग जाते समय सिर्फ अपनी मौजूदगी नहीं ले जाते।
वे अपने साथ हमारी कई उम्मीदें भी ले जाते हैं।
और फिर घर की अपेक्षाएँ।
हर घर में कुछ अनकहे बोझ होते हैं।
जो शब्दों में नहीं दिखते, लेकिन कंधों पर महसूस होते रहते हैं।
उसे लगता था कि उसे कुछ बड़ा करना चाहिए।
कुछ साबित करना चाहिए।
लेकिन क्या?
कैसे?
इसका जवाब उसके पास नहीं था।
सबसे ज़्यादा उसे तब दर्द होता था जब वह अपने छोटे भाई-बहनों को आगे बढ़ते देखता।
वे नौकरी पा रहे थे।
अपनी ज़िंदगी में स्थिर हो रहे थे।
और वह...
उसे लगता था जैसे वह किसी स्टेशन पर खड़ा रह गया है जबकि बाकी सभी ट्रेन पकड़कर आगे निकल चुके हैं।
वह खुश भी था उनके लिए।
लेकिन कहीं अंदर एक सवाल बार-बार उठता था—
"क्या मैं पीछे छूट गया हूँ?"
उस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं था।
शायद उसके पास भी नहीं।
रातें सबसे मुश्किल होती थीं।
दिन में इंसान खुद को कामों में उलझा सकता है।
लेकिन रात...
रात सच बोलती है।
जब सब सो जाते थे, वह कमरे में अकेला बैठा रहता।
कभी लैपटॉप की स्क्रीन देखता।
कभी कैमरा।
कभी गिटार।
कभी किताबें।
और कभी छत।
फिर अचानक बहुत सारे विचार आने लगते।
इतने सारे कि साँस लेना भारी लगने लगता।
भविष्य का डर।
अतीत का दुख।
वर्तमान की उलझन।
सब एक साथ।
और फिर...
अचानक कुछ भी नहीं।
सिर्फ खालीपन।
जैसे मन ने हार मान ली हो।
जैसे सारी भावनाएँ थककर कहीं बैठ गई हों।
उसे समझ नहीं आता था कि यह क्या है।
क्या यह उदासी है?
थकान है?
या वही चीज़ जिसे लोग अवसाद कहते हैं?
वह नहीं जानता था।
शायद इसलिए क्योंकि उसने कभी खुद को समझने के लिए रुककर देखा ही नहीं।
वह हमेशा भागता रहा।
कभी सपनों के पीछे।
कभी ज़िम्मेदारियों के पीछे।
कभी लोगों के पीछे।
और अब जब सब कुछ धीमा हुआ, तो उसे खुद की आवाज़ सुनाई देने लगी।
लेकिन वह आवाज़ भी साफ़ नहीं थी।
सिर्फ कुछ टूटे हुए सवाल थे।
कभी-कभी उसे लगता था कि वह बड़ा होना चाहता है।
मजबूत बनना चाहता है।
ज़िंदगी को संभालना चाहता है।
लेकिन फिर वही सवाल सामने खड़ा हो जाता—
"कैसे?"
कोई किताब उसका जवाब नहीं देती।
कोई वीडियो नहीं।
कोई सलाह नहीं।
क्योंकि कुछ रास्ते ऐसे होते हैं जिन्हें दूसरों के शब्दों से नहीं, अपने कदमों से समझना पड़ता है।
उसका कमरा अब भी वैसा ही था।
सपनों से भरा हुआ।
संभावनाओं से भरा हुआ।
लेकिन उन सबके बीच बैठा वह लड़का खुद को खाली महसूस करता था।
शायद इसलिए नहीं कि उसके पास कुछ नहीं था।
बल्कि इसलिए क्योंकि वह उन सभी चीज़ों के बीच खुद को खो चुका था।
खिड़की से आती हवा ने मेज़ पर रखे कुछ पन्नों को हिलाया।
उसकी अधूरी कहानी का आखिरी पन्ना खुल गया।
उसने उसे देखा।
काफी देर तक।
फिर हल्की सी मुस्कान आई।
बहुत छोटी।
लगभग अदृश्य।
क्योंकि अचानक उसे महसूस हुआ कि उसकी कहानी और उस डायरी की कहानी में एक समानता थी।
दोनों का अंत अभी लिखा नहीं गया था।
लेकिन शायद...
शायद हर अधूरी चीज़ का मतलब खत्म होना नहीं होता।
कुछ कहानियाँ सिर्फ इसलिए अधूरी दिखती हैं क्योंकि उनका अगला अध्याय अभी लिखा जाना बाकी होता है।
कमरे में फिर वही खामोशी थी।
वही लैपटॉप।
वही कैमरा।
वही गिटार।
वही किताबें।
और वही लड़का।
लेकिन इस बार उसके पास कम से कम एक बात तो थी—
वह अभी भी कहानी के बीच में था।
अंत तक नहीं पहुँचा था।
और शायद इसी वजह से...
वह इस कहानी का अंत नहीं लिख पाया।
क्योंकि उसे भी नहीं पता कि आगे क्या होने वाला है।
इसलिए उसने कलम रख दी।
और कहानी यहीं छोड़ दी।
बिल्कुल अपनी ज़िंदगी की तरह—
अधूरी, शांत, अकेली... और फिर भी कहीं न कहीं, अभी ज़िंदा।