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Vo Kahaniya



हमारा गाँव बहुत छोटा था—सिर्फ़ सात–आठ घर। 

मगर उन घरों की धड़कन एक ही थी। 

गाँव के किनारे खड़ा वह पुराना ट्रांसफॉर्मर। 

पिछले अड़तीस–उनतालीस सालों से वही हमें रोशनी देता आया था।

 उसी की बदौलत हमारे आँगन में बल्ब जले, रातों में पंखे चले, कुएँ से पानी निकला, और खेतों में फ़सलें लहलहाईं। 

हम उसी रोशनी में बच्चे से जवान हुए।

 उसी की हल्की-सी घरघराहट के बीच हमारी नींद पूरी हुई। 

कभी हमने सोचा भी नहीं था कि एक दिन वह रुक जाएगा—आख़िर मशीन ही तो है, कब तक चलती?

 बचपन में हमने उस पर पत्थर भी फेंके। नादानी थी, शरारत थी। 

वह चुपचाप सब सहता रहा—बिना शिकायत, बिना शोर।

 उस सुबह अचानक तेज़ आवाज़ आई। 

शॉर्ट सर्किट की एक चिंगारी, एक झटका।

 हमने सोचा—आम बात होगी। किसी ने बिजली विभाग को फोन कर दिया। 

धीरे-धीरे पूरे गाँव के लोग इकट्ठा हो गए। 

सबकी नज़र उसी जगह पर थी जहाँ वह सालों से खड़ा था।

 बिजली विभाग की टीम आई और बस इतना कहा— “अब यह ट्रांसफॉर्मर सर्विस में नहीं है।” इतना सुनते ही दिल जैसे खाली हो गया।

 मुझे लगा जैसे परिवार का कोई बुज़ुर्ग चला गया हो।

 वह जिसने बिना कुछ माँगे सब कुछ दिया। 

गर्मी में राहत, रात में सुकून, फ़सल में जान। 

आज अचानक चुप हो गया। उस जगह पर गाँव के हर घर से लोग आए थे। 

वही लोग जिनके बीच छोटे–छोटे मनमुटाव थे, वही लोग जो रोज़ मुश्किल से एक-दूसरे से बात करते थे। 

आज सब खामोश थे—एक ही दुःख में जुड़े हुए।

 चार दशक तक जिसने हमें रोशनी, पानी और ज़िंदगी दी, आज उसके “रिटायरमेंट” के गवाह हम सब थे। 

शाम तक नया ट्रांसफॉर्मर आ गया।

 स्थापना में हर किसी ने हाथ बँटाया। 

जब बिजली फिर से आई, बल्ब दोबारा जले, तो गाँव में उजाला लौट आया। 

मगर… दिल के किसी कोने में अँधेरा रह गया। रोशनी थी, पर वो अपनापन नहीं था। 

आवाज़ वही थी, पर एहसास बदल चुका था। आज हमने समझा— कुछ मशीनें सिर्फ़ मशीन नहीं होतीं। 

कुछ लोहे के ढाँचे पूरी पीढ़ियों की यादें बन जाते हैं। 

और जब वो चले जाते हैं, तो बिजली तो लौट आती है… 

मगर एक दौर, एक एहसास, हमेशा के लिए चला जाता है।

— आयुष राउत


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वो स्ट्रीट लाइट

हमारी कॉलोनी के मोड़ पर एक पुरानी स्ट्रीट लाइट खड़ी थी।

आज के बच्चों के लिए वह बस लोहे का एक खंभा रही होगी, लेकिन हमारे परिवार के लिए वह यादों का एक पूरा खज़ाना थी।

जब भी रात में हम उस रास्ते से गुजरते, पिताजी अक्सर उसकी ओर इशारा करके मुस्कुरा देते और कहते—

"यहीं बैठकर मैं और तुम्हारे चाचा पढ़ाई किया करते थे।"

उन दिनों हर घर में पर्याप्त रोशनी नहीं होती थी। बिजली का आना-जाना लगा रहता था। तब उस एक स्ट्रीट लाइट की पीली रोशनी कई सपनों का सहारा बन जाती थी।

पिताजी बताते थे कि वे अपनी किताबें लेकर उसके नीचे बैठ जाते। कभी गणित के सवाल हल करते, कभी परीक्षाओं की तैयारी करते। पढ़ाई से थक जाते तो वहीं दोस्तों के साथ खेलना शुरू कर देते।

वह स्ट्रीट लाइट सिर्फ़ रोशनी नहीं देती थी, वह बच्चों के सपनों को भी उजाला देती थी।

उसकी रोशनी में न जाने कितने विद्यार्थियों ने अपने भविष्य के सपने देखे होंगे।

कितने मज़दूर देर रात घर लौटते समय उसी की रोशनी में रास्ता पहचानते होंगे।

कितनी माताएँ अपने बच्चों का इंतज़ार करते हुए उसी रोशनी की ओर देखती होंगी।

वह हर किसी की साथी थी।

बरसात आई, आँधियाँ आईं, तेज़ हवाएँ चलीं।

कभी उसके शीशे टूटे, कभी रंग उखड़ गया।

लेकिन वह वहीं खड़ी रही—बिना शिकायत, बिना थके।

उसने पीढ़ियाँ बदलते देखीं।

बच्चों को बड़ा होते देखा।

दोस्तों को बिछड़ते देखा।

पुराने घरों को टूटते और नए मकानों को बनते देखा।

वह चुपचाप सब कुछ देखती रही।

फिर समय बदला।

हर घर में तेज़ एलईडी बल्ब आ गए।

मोबाइल फोन की टॉर्च ने अँधेरे को छोटा कर दिया।

बच्चे अब मैदानों से ज़्यादा स्क्रीन पर समय बिताने लगे।

धीरे-धीरे उस स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठने वाले लोग कम होते गए।

आज वह पुरानी स्ट्रीट लाइट वहाँ नहीं है।

उसकी जगह आधुनिक लाइटें लग गई हैं।

वे ज़्यादा चमकदार हैं, ज़्यादा नई हैं, और शायद ज़्यादा बेहतर भी।

लेकिन उनमें वो कहानियाँ नहीं हैं।

वो यादें नहीं हैं।

वो अपनापन नहीं है।

आज जब मैं उस खाली जगह को देखता हूँ, तो लगता है जैसे हमारी संस्कृति का एक छोटा-सा हिस्सा हमारे साथ नहीं रहा।

क्योंकि कुछ चीज़ें सिर्फ़ चीज़ें नहीं होतीं।

कुछ खंभे, कुछ पेड़, कुछ पुरानी मशीनें और कुछ स्ट्रीट लाइटें...

हमारी ज़िंदगी के गवाह बन जाती हैं।

उन्होंने लाखों लोगों को रास्ता दिखाया,

हज़ारों सपनों को रोशनी दी,

और बदले में कभी कुछ नहीं माँगा।

शायद इसी लिए आज भी जब पिताजी उस जगह से गुजरते हैं, उनकी आँखों में एक हल्की-सी चमक आ जाती है।

क्योंकि उन्हें सिर्फ़ एक स्ट्रीट लाइट याद नहीं आती...

उन्हें अपना बचपन याद आता है। 

— आयुष राउत